भारतीय संगीत जगत की वो आवाज़ जिसने सात दशकों तक हर पीढ़ी के दिल की धड़कन को सुरों में पिरोया, आज हमेशा के लिए खामोश हो गई। मशहूर पार्श्व गायिका आशा भोसले का रविवार को निधन हो गया। उनके जाने की खबर ने न केवल फिल्म इंडस्ट्री बल्कि पूरी दुनिया में उनके करोड़ों प्रशंसकों को गमगीन कर दिया है। ‘नया दौर’ की शोखी से लेकर ‘उमराव जान’ की संजीदगी तक, उनकी आवाज़ का विस्तार इतना बड़ा था कि उसे चंद शब्दों में समेटना नामुमकिन है।
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इतिहास गवाह है कि आशा भोसले का नाम भारतीय संगीत की एक ऐसी हस्ती के रूप में शुमार था, जिन्होंने प्लेबैक सिंगिंग की परिभाषा ही बदल दी। अक्सर कहा जाता है कि शरीर नश्वर है, लेकिन कुछ आवाज़ें हवा में ठहरी रह जाती हैं। ‘तीसरी मंज़िल’, ‘हरे रामा हरे कृष्णा’ और ‘इजाज़त’ जैसी फिल्मों के ज़रिए उन्होंने साबित किया कि वक्त बदल सकता है, पर्दे पर नायिकाएं बदल सकती हैं, पर आशा की आवाज़ हमेशा जवान रहेगी।
हालांकि, इस चमक-धमक के पीछे उनके लंबे और कठिन संघर्ष की दास्तान अक्सर कम सुनाई देती है। सच तो यह है कि अपनी विलक्षण प्रतिभा के बावजूद उन्हें लंबे समय तक ‘नंबर दो’ के पायदान से ही संतोष करना पड़ा। वजह यह थी कि हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में ‘नंबर एक’ पर उनकी अपनी ही बड़ी बहन, महान लता मंगेशकर का एकछत्र राज था। उस दौर में लता नाम के सूरज की चमक के आगे अपनी अलग लौ जलाना आशा की एक बड़ी ज़िद थी।
यह संघर्ष लगभग असंभव जैसा था, लेकिन अपनी ज़िद और बेमिसाल प्रतिभा के दम पर आशा उस साये से बाहर निकलीं और अपना एक मुकम्मल आसमान बनाया। उनके पिता दीनानाथ मंगेशकर शास्त्रीय संगीत के ज्ञाता थे, जिनसे उन्हें सुरों की विरासत मिली थी। बचपन में लता और आशा की जोड़ी अटूट थी, लेकिन जब आशा महज़ नौ साल की थीं, तब पिता का साया सिर से उठ गया और मंगेशकर परिवार गहरे आर्थिक संकट में घिर गया।
गुज़ारे की तलाश में परिवार 1945 में बंबई आ बसा, जहाँ 14 साल की लता ने पूरे परिवार की ज़िम्मेदारी उठाई। जल्द ही आशा भी उनके इस कठिन संघर्ष में साथ हो लीं। साल 1948 में फिल्म ‘चुनरिया’ के ज़रिए उन्होंने पार्श्व गायन की दुनिया में कदम रखा, जहाँ उन्होंने गीता दत्त और शमशाद बेगम के साथ ‘सावन आया रे’ गाया। इसके ठीक एक साल बाद उन्हें अपना पहला सोलो गीत मिला, लेकिन यही वो वक्त था जब लता ‘आएगा आनेवाला’ से शिखर पर पहुँच गई थीं।
1950 के दशक में जहाँ लता तेज़ी से सफलता की सीढ़ियां चढ़कर नौशाद और एसडी बर्मन जैसे दिग्गजों की पहली पसंद बन गईं, वहीं आशा को ज़्यादातर बी-ग्रेड या कम बजट वाली फिल्मों में ही मौके मिलते थे। फिल्म इतिहासकार राजू भारतन बताते हैं कि उस दौर में आशा महज़ एक ‘स्ट्रगलर’ थीं। अगर निर्माता लता को नहीं ले पाते थे, तो उनकी अगली पसंद गीता दत्त होती थीं, आशा का नाम उस फेहरिस्त में काफी नीचे आता था।
आशा के साथ एक बड़ी समस्या उनकी ‘मराठी-मिश्रित हिंदी’ और उच्चारण की भी थी, जिस पर उन्होंने शुरुआती दौर में उतना काम नहीं किया था। इसके अलावा, उनकी निजी ज़िंदगी के उतार-चढ़ाव ने भी उनकी राह मुश्किल कर दी। 16 साल की उम्र में परिवार की मर्ज़ी के खिलाफ गणपतराव भोसले से शादी करने के फैसले ने दोनों बहनों के रिश्तों में ऐसी दरार डाली जो बरसों तक नहीं भरी। लता इस शादी के सख्त खिलाफ थीं और सालों तक दोनों के बीच बातचीत बंद रही।
गणपतराव के साथ उनकी शादी पेशेवर ज़िंदगी के लिए किसी त्रासदी से कम नहीं थी। आशा ने खुद स्वीकार किया था कि वह एक रूढ़िवादी परिवार था जहाँ एक ‘सिंगिंग स्टार’ बहू मंज़ूर नहीं थी। उनके पति का व्यवहार भी काफी कठिन था, जिससे उनके करियर की गति और धीमी हो गई। जबकि इसी दौरान लता मंगेशकर कामयाबी के उस शिखर पर पहुँच चुकी थीं जहाँ से उन्हें कोई हिला नहीं सकता था।
आशा के करियर में असली मोड़ तब आया जब उनकी मुलाकात संगीतकार ओपी नैयर से हुई। नैयर का मानना था कि वे लता के बिना भी सुपरहिट संगीत दे सकते हैं। उन्होंने आशा की आवाज़ के निचले सुरों को पहचाना और ‘नया दौर’ के ज़रिए इतिहास रच दिया। ‘उड़े जब-जब जुल्फें तेरी’ जैसे गीतों ने आशा को पहली बार फिल्म की मुख्य अभिनेत्री की आवाज़ बनाया और उन्हें बड़े फिल्म कैंपों का हिस्सा बना दिया।
1957 में जब एसडी बर्मन और लता के बीच मनमुटाव हुआ, तो आशा उनके कैंप की मुख्य गायिका बनकर उभरीं। किशोर कुमार और आशा की जोड़ी ने ‘हाल कैसा है जनाब का’ जैसे यादगार नगमे दिए। बर्मन दादा ने न केवल उनकी शोखी का इस्तेमाल किया, बल्कि ‘सुजाता’ और ‘लाजवंती’ जैसी फिल्मों में उनसे बेहद गंभीर गीत गवाकर उनकी प्रतिभा का लोहा मनवा लिया।
ओपी नैयर के साथ उनकी साझेदारी इतनी गहरी थी कि उन्होंने 60 फिल्मों में 324 गीत गाए। लेकिन इस कामयाबी के बावजूद उस दौर में भेदभाव कायम था; जहाँ लता एक गाने के 500 रुपये लेती थीं, वहीं आशा को महज़ 150 रुपये में संतोष करना पड़ता था। यह भेदभाव उन्हें भीतर तक चुभता था, जिसे उन्होंने एक चुनौती की तरह लिया और खुद को हर सांचे में ढालने की ठान ली।
बाद में आरडी बर्मन यानी पंचम के साथ उनकी रचनात्मक और रूमानी साझेदारी ने हिंदी संगीत की तासीर ही बदल दी। पंचम के फंक और रॉक-एन-रोल संगीत को निभाने के लिए आशा की लचकदार आवाज़ सबसे मुफीद साबित हुई। ‘पिया तू अब तो आजा’ और ‘दम मारो दम’ ने उन्हें एक आधुनिक ‘वेस्टर्न वाइब’ वाली गायिका के रूप में स्थापित किया, तो वहीं ‘इजाज़त’ के गानों ने उनके दर्द को बयां किया।
सबसे बड़ा बदलाव ‘उमराव जान’ के वक्त आया, जब खय्याम ने उनसे डेढ़ सुर नीचे गवाकर दुनिया को उनकी आवाज़ का मखमली और संजीदा पहलू दिखाया। ‘दिल चीज़ क्या है’ जैसी ग़ज़लों के लिए उन्हें राष्ट्रीय पुरस्कार मिला। अपने आखिरी वर्षों में भी उन्होंने एआर रहमान के साथ काम करके साबित किया कि उनकी आवाज़ पर उम्र का पहरा नहीं है। आशा का सफर संघर्ष की वो मिसाल है जिसने साबित किया कि ज़िद अगर सही हो, तो अपनी मंज़िल खुद बनाई जा सकती है।