नासा के आर्टेमिस-2 मिशन पर गए अंतरिक्षयात्रियों ने अंतरिक्ष विज्ञान के इतिहास में एक नया अध्याय जोड़ दिया है। 5 अप्रैल की तड़के तक यह अंतरिक्षयान पृथ्वी से लगभग 321,869 किलोमीटर की दूरी तय कर चुका था। इस दौरान एस्ट्रोनॉट्स ने चंद्रमा के ‘ओरिएनताले बेसिन’ का वह हिस्सा अपनी आंखों से देखा, जिसे आज तक किसी भी इंसान ने सीधे तौर पर नहीं देखा था। नासा ने इस ऐतिहासिक पल की तस्वीर साझा करते हुए इसे मिशन की एक बड़ी उपलब्धि बताया है।
स्पेसक्राफ्ट के भीतर कैसी है एस्ट्रोनॉट्स की जिंदगी?
भले ही यह मिशन डीप स्पेस की खोज के लिए है, लेकिन ओरायन अंतरिक्षयान के भीतर अंतरिक्षयात्रियों की दिनचर्या काफी हद तक सामान्य जीवन जैसी ही है। मिशन स्पेशलिस्ट क्रिस्टिना कॉख, जो डीप स्पेस में जाने वाली पहली महिला बनी हैं, ने बताया कि इस 10 दिवसीय यात्रा की तैयारी किसी कैंपिंग ट्रिप जैसी थी। यान में खाने-पीने के खास इंतजाम किए गए हैं, जिनमें 58 टॉर्टिला, 43 कप कॉफी और पांच अलग-अलग तरह के सॉस शामिल हैं। एस्ट्रोनॉट्स वहां स्मूदी और मैक एंड चीज का लुत्फ उठा रहे हैं।
पहली बार मिला ‘असली टॉयलेट’ और स्पेस प्लंबर की भूमिका
1960-70 के दशक के अपोलो मिशनों के विपरीत, जहाँ अंतरिक्षयात्रियों को ‘वेस्ट कलेक्शन बैग’ का इस्तेमाल करना पड़ता था, आर्टेमिस-2 में पहली बार एक आधुनिक टॉयलेट की सुविधा दी गई है। क्रिस्टिना कॉख ने गर्व के साथ खुद को “स्पेस प्लंबर” बताते हुए कहा कि यह यान का सबसे महत्वपूर्ण उपकरण है। हालांकि, इस टॉयलेट का उपयोग करना थोड़ा चुनौतीपूर्ण है क्योंकि यह बहुत शोर करता है, जिसके कारण अंतरिक्षयात्रियों को कान की सुरक्षा के लिए विशेष उपकरण (ईयर प्रोटेक्शन) पहनने पड़ते हैं।

चमगादड़ की तरह सोना और जरूरी व्यायाम
शून्य गुरुत्वाकर्षण (जीरो ग्रेविटी) में सोने के लिए अंतरिक्षयात्री दीवार से बंधे स्लीपिंग बैग का इस्तेमाल करते हैं। रीड वाइसमैन ने खुलासा किया कि क्रिस्टिना कॉख यान के बीच में सिर नीचे करके सोती हैं, जो काफी आरामदेह है। इसके अलावा, माइक्रोग्रैविटी के कारण हड्डियों और मांसपेशियों को होने वाले नुकसान से बचने के लिए हर यात्री रोजाना 30 मिनट एक्सरसाइज करता है। यह सख्त रूटीन उन्हें चांद के उपकरणों की निगरानी और जांच जैसे महत्वपूर्ण कार्यों के लिए फिट रखता है।