ईरान के स्टील उद्योग पर इस्राएली बमबारी से कोहराम, मोबारकेह और खुजेस्तान प्लांट को भारी नुकसान

प्रकाशित: 06 अप्रैल, 2026
यह तस्वीर विकिपीडिया से साभार है

ईरान और इस्राएल के बीच जारी युद्ध अब ईरान की आर्थिक कमर तोड़ने की दिशा में मुड़ गया है। इस्फहान स्थित ‘मोबारकेह स्टील’ और अहवाज के ‘खुजेस्तान स्टील’ प्लांट पर हुई हालिया बमबारी ने पूरे ईरान में तीखी प्रतिक्रिया पैदा कर दी है। ईरान के ये दो सबसे बड़े स्टील उत्पादक न केवल देश की औद्योगिक शक्ति के प्रतीक हैं, बल्कि अर्थव्यवस्था के सबसे मजबूत स्तंभ भी माने जाते हैं। इन हमलों ने आम ईरानियों को झकझोर दिया है और अब बहस इस बात पर छिड़ गई है कि क्या नागरिक औद्योगिक बुनियादी ढांचे को निशाना बनाना जायज है?

सैन्य निशाना या नागरिक ढांचा?

हमलों के समर्थन में दलील दी जा रही है कि ये स्टील प्लांट प्रत्यक्ष रूप से उस आर्थिक नेटवर्क का हिस्सा हैं, जिससे इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कोर (आईआरजीसी) को फंडिंग मिलती है। वहीं, विशेषज्ञों का दूसरा पक्ष इसे शुद्ध रूप से नागरिक बुनियादी ढांचे पर हमला मान रहा है। गौरतलब है कि 2025 में ईरान कच्चे स्टील के दुनिया के शीर्ष उत्पादकों में शामिल था, जिसका सालाना उत्पादन लगभग 3.18 करोड़ टन रहा। अकेले मोबारकेह स्टील ने मार्च 2025 से जनवरी 2026 के बीच निर्यात के जरिए 86 करोड़ डॉलर की भारी-भरकम कमाई की थी।

सप्लाई चेन और रोजगार पर करारी चोट

इन विशाल कारखानों पर हमले का असर सिर्फ मशीनों के नुकसान तक सीमित नहीं है। खुजेस्तान स्टील में लगभग 10,000 मजदूर काम करते हैं, जिनमें से अधिकतर ठेके पर हैं। यदि काम लंबे समय तक ठप रहा, तो हजारों परिवारों के सामने रोजी-रोटी का संकट खड़ा हो जाएगा। आर्गस मीडिया की रिपोर्ट के अनुसार, हमलों में गोदामों और बिजली के बुनियादी ढांचे को गंभीर क्षति पहुँची है। स्टील निर्माण के लिए निरंतर बिजली अनिवार्य है; बिजली कटने से मशीनों में गर्म लोहा जम सकता है, जिससे अरबों का स्थायी नुकसान होने की आशंका है।

चौतरफा संकट में घिरी ईरानी अर्थव्यवस्था

मौजूदा हालात में ईरान पर तीन तरफा मार पड़ रही है—युद्ध की तबाही, अंतरराष्ट्रीय पाबंदियां और गहराता आर्थिक कुप्रबंधन। ‘द वॉल स्ट्रीट जर्नल’ के मुताबिक, खुजेस्तान स्टील ने फिलहाल कामकाज रोक दिया है, जबकि मोबारकेह में नुकसान के बावजूद उत्पादन जारी रखने की कोशिश की जा रही है। जानकारों ने चेतावनी दी है कि यदि युद्ध के बाद भी पाबंदियां जारी रहीं, तो देश के कुशल कामगार पलायन कर सकते हैं, जिससे भविष्य में अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाना नामुमकिन हो जाएगा। इन हमलों ने उस जड़ पर चोट की है जो ईरान के लाखों लोगों को नौकरियां और देश को विदेशी मुद्रा दिलाती थी।

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